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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 156, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

महाकाश में निरन्तर बढ़ रहे अतएव विशालकाय हुए तुम रोक-टोक के बिना ही आधारभूत अनन्त आकाश में चढ़ने से परमार्थभूत महाकाश की शून्यता से उत्पन्न हुई आँधियों के सदृश सृष्टियों को देखोगे जो अज्ञाततास्वभावरूप द्रवता की वृद्धि से आविर्भूत चित्समुद्र के तरंगरूप हैं | जैसे संवितृघन स्वप्न में शून्यरूप नगर आदि प्रकाश में आते हैं वैसे ही उस समय बिना रोक-टोक के अनेकों सृष्टियाँ तुम्हारे दृष्टिगोचर होगी। जैसे क्षोभित आँधियों से पत्तों की राशियाँ आकाश में छितरा जाती हैं वैसे ही महाकाश में छितराई हुई अनन्त सृष्टियों को अक्षीण संकल्पवाले तुम देखोगे । जैसे महलों के अन्दर बैठी हुई महिलाओं को चित्र विचित्र झरोखों से बाहर स्थित नृत्यसभा का सत्यत्व दर्शन रुचता है और जिनको नहीं रुचता है ऐसी स्त्रियों के लिए विचित्र वातायन सत्‌ होते हुए भी प्रायः असत्‌ है वैसे ही चिदाकाश में रहता हुआ भी असद्रूप ही है। भूमि में स्थित सब लोगों को धुआँ, कुहरा, धूलि आदि का समूह चन्द्रमण्डल से सटा हुआ-सा दिखाई देता है लेकिन चन्द्रमण्डल में स्थित लोगों की दृष्टि से वह जैसे अत्यन्त असत्‌ है ठीक वैसे ही जगत्‌ भी आत्मा के अभेद को प्राप्त हुए तत्त्ववेत्ता में अत्यन्त असत्‌ हे । फिर सृष्टि फिर आकाश, फिर सृष्टि फिर आकाश इस प्रकार देखते देखते तुम्हारा लम्बा समय वहाँ बीत जायेगा । तदनन्तर दीर्घकाल के बाद महामहिमाशाली अव्यक्त आकाश में, जिसमें सृष्टिरूपी पत्ते इधर उधर स्फुरित होते है, तुम स्वयं ऊब जाओगे | तदनन्तर तपस्या के फल का अनुभव करते हुए तुम उद्वेग को प्राप्त होगे तब तुम अनन्त आकाश को भर डालनेवाले अपने विशाल शरीर को देखोगे और कहोगे : यह मेरा कुत्सित शरीर भी क्या है ? जिसमें लाखों मेरु आदि महापर्वत भी तृण के तुल्य लघु हैं, यह मेरे लिए भारभूत-सा हो गया हे । मेरा यह शरीर वेप्रमाण हो गया है मेने इससे सारे आकाश को व्याप्त कर दिया। आज भी मैं आकाश को भरता जाता हूँ, किन्तु आगे क्या होगा यह मेरी भी समझ में बिलकुल नहीं आता है ॥३ २-४ २॥ हाय, मुझे यह दृश्यरूप अविद्या भीषण और असीम प्रतीत होती है । कोई भी सम ब्रह्मज्ञान के बिना इसका आरपार नहीं पा सकता