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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 156, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 45

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

असीम ओर-छोर रहित और आकाश में निराधार स्थित यह मेरा शरीर भी क्या है जिससे कि तत्त्वज्ञानियों का संगम दुर्लभ हे