Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 16, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 16, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 16 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अन्तःशुद्धमनस्का ये सुचिरायाभयप्रदम् ।
मनागप्युपदिष्टास्ते प्राप्नुवन्ति परं पदम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष के ज्ञान में चिरकालिक अभ्यास ही कारण हैं, यह नियम तो
है ही, इस आशय से कहते हैं ।
चिरकाल के अभ्यास से जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे महानुभाव तो थोड़ा भी
उपदेश पाकर अभयप्रद परम पद को (ज्ञान को) प्राप्त कर लेते हैं