Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 19–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
जडकल्लोलबहुला कलुषोल्लासफेनिला ।
चक्रावर्ताक्षयमयी प्रावृषीव तरङ्गिणी ॥ १९ ॥
अनारतवहच्छून्यजगन्मृगनदीशता ।
रजोराशिमयी रूक्षा शवभूरिव दुर्भगा ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
क्या मैं मृग-देह से यह सब स्मरण करूँगा ? इस प्रश्नपर "नही" कहते हैं।
जब तुम मृगयोनि से मुक्ति पाकर पुरुष होओगे तब ज्ञानागिनिद्रारा देह के दग्ध होनेपर हृदयस्थ
आत्मतत्त्व तुम्हं स्फुरित होगा । आत्मतत्त्व के स्फुरण से चिरकाल से हृदय में स्थित अविद्यानामक
भ्रान्ति का त्यागकर स्पन्दशून्य वायु के समान निश्चल हुए तुम निर्वाण को प्राप्त होओगे