Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अन्तं प्राप्नोति न यथा चिरं स्वप्नपुरे चरन् ।
जाग्रदाख्ये स्वप्नपुरे तथैवास्मिंश्चिरं चरन् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त देवराज इन्द्र के यों कहनेपर उसी क्षण में “यह मैं इस वन में हिरन हूँ” ऐसी मेरी निश्चित
(व्यावहारिक अर्थक्रिया में समर्थ) प्रतिभा उद्भूत हुई