Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
यानि संकल्पजालानि प्रतिष्ठामागतान्यलम् ।
त्यक्तैकदृश्यजालस्थदेहानां दृढचेतसाम् ॥ २२ ॥
स्थितानि तानि चिद्व्योम कोशरत्नान्यसंकटम् ।
विमानपुरभूम्यादिरूपेणेत्थं स्थितात्मना ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब से लेकर वहीं पर्वतपर मैं मन्दार के
वन के भीतरी कोनो में तिनके ओर दूब के अंकुर चरनेवाला हिरन हो गया । तदुपरान्त किसी एक
समय शिकार खेलने के लिए आये हुए सीमावर्ती सामन्त को देखकर मारे उरके मैं चौकड़ी मारकर
भागा