Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 25–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 25,26
संस्कृत श्लोक
सुवर्णमणिमाणिक्यमुक्तावनिमयानि च ।
भक्ष्यभोज्यान्नपानाढ्यरसायनसरांसि च ॥ २५ ॥
मधुमद्यदधिक्षीरघृतकुल्याकुलानि च ।
रसायनमयाकारवनितावलितानि च ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे निष्पाप, मैने आपसे अपना यह सारा वृत्तान्त
कह दिया है, जो संसार में प्रसिद्ध ऐन्द्रजालिक की माया के तुल्य विविध आश्चर्यों से पूर्ण हे । इस
प्रकार नाना शाखा-प्रशाखाओं से युक्त यह अविद्या अनन्त है, इसका आरपार नहीं है यह आत्मज्ञान
के सिवा अन्य किसी उपाय से शान्त नहीं हो सकती