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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 33–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

नान्यत्किंचन नामेह ब्रह्ममात्रमयात्मनि । संभवत्यङ्ग तेनैतदुच्यतामस्तु किंमयम् ॥ ३३ ॥ सर्गादावेव सर्गादि किंचनापीदमस्ति नो । कारणाभावतस्तेन जगत्किंमयमस्त्विदम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

देवमृगश्च त्वं तुल्यकालं विपश्चिता" (जितने समय तक विपश्चित्‌ मृग रहेगा उतने ही समय तक तुम भी देवमृग रहोगे) इस वाक्य द्वारा जैसे विपश्चित्‌ के मन से संकल्पित मृगत्व अन्य लोगों के दर्शन आदि अर्थक्रियाकारी है वैसा ही तुम्हारा भी हो यों उसे शाप दिया, इसलिए इन्द्र-शाप की कथा से ही मुनिजी के वचन के बल से यद्यपि विपश्चित्‌ की मृगता संकल्पवश हुई थी फिर भी वह आप सरीखे सब लोगों की दृष्टियों की सदा विषय हुई हे