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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 163, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

संविदं संविदाकाशे संरोप्य हृदि तिष्ठतः । स्वयमेव मनः शाम्येन्नीहार इव शारदः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ का ही उपपादन करते हैं। सर्ग शब्द का अर्थ जैसा स्वबुद्धि में स्थित होता है वैसा ही स्फुरित होता है उससे अन्य नहीं, यह निर्विवाद बात है | उसमें पागल और भले चंगे स्वस्थ मस्तिष्कवाले की तरह भ्रान्त ओर अभ्रान्तरूप इनके परस्पर के तत्‌-तत्‌ प्रपंच का रूप आन्तरबुद्धि में स्थित होने के कारण अन्तःस्थ है। विद्वानों की बुद्धि सदा स्थिरता में जाग्रत रहती है इसलिए वह स्थिर आत्मतत्त्व को देखता है और अविद्वान्‌ की बुद्धि अस्थिरता में जाग्रत रहती है इसलिए वह अस्थिर बाह्य को ही देखता है। बुद्धिगत प्रपंचस्वरूप न तो अत्यन्त आन्तर है और न अत्यन्त बाह्य है, इसलिए दोनों को ही उसका ठीक परिज्ञान नहीं है, यह अर्थ है