Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 54
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हिन्दी अर्थ
विचारे
गये इस श्रेष्ठतम शास्त्र से जो बोध उत्पन्न होते हैं उन बोधों से अन्य शास्त्र एेसे रुचिकर लगते हैं
जैसे कि लवण से व्यंजन रुचिकर होते हैं, इसलिए यह शास्त्र सकल शारत्रों का उपजीव्य है