Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 55
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यह आख्यान काव्य होने के कारण अनुपादेय है यों इसका अनादर कर भोगो में आसक्तबुद्धि वाले
अतएव आत्महत्या करनेवाले यानी बार-बार मृत्युपरम्परा प्राप्ति में हेतुभूत मोहरूपी गड्ढे में गिरनेवाले
उससे पुनः पुनः संसार भागी (जन्मभागी) आप लोग न हों