Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 167, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अनुभूतमपि व्यर्थं प्रतिबिम्बाङ्गनासमम् ।
नानानुभवनिर्माणं वस्तु शून्यं तु वस्तुतः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व वर्णित आत्मख्याति का उपसंहार करते हए पहले जो ˆशिलाजठरर्निधनाम्” -शिला के अन्दर
के समान ठोस ऐसा पद कहा था उसकी शिलोपाख्यान द्वारा व्याख्या करने के लिए भूमिका बोधते है।
आत्मा ओर ख्याति पद के वाच्य अर्थ से विरहित, आत्मा ओर ख्याति के लक्ष्यार्थ आदि अन्त से
शून्य, वाणी का अविषय यह आगे कहा जानेवाला एकमात्र ठोसरूप से स्थित आत्मख्यातिपद का अर्थ
हे