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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

जरातुषाराशनिभिर्भूयोभूयो जडीकृतः । जन्मजङ्गलसारङ्गो व्यर्थव्यग्रविहारवान् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहे कि स्वप्न स्मृति ही है । अन्य स्मृतियों में, जो संस्कारजन्य तथा विषयशून्य होती हैं, "सोऽयं" यों तत्ता भासित होती है । किन्तु स्वप्न में निद्रारूपी दोष से इदन्तागोचरत्वांश में संस्कार का उद्बोध होने से तत्तांशका अपहरण हो जाता है, अतः इदन्ता भासित होती है । इसलिए यह बुद्धिजन्यसंस्कार दृश्य दोनों ही जगह एक ही वस्तु है इत्यादि शंका तो ठीक नहीं हे । क्योकि तत्ता इदन्ता कैसे होगी ? अपरोक्ष में (प्रत्यक्ष में) इदन्ता प्रसिद्ध है, लेकिन स्मृतिमे तो असन्निकृष्ट (दूरवर्ती) परोक्ष ही है, इसलिए यह कैसे घट सकता हे, कहिये, यह अर्थ है