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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

परमात्मपरिक्रान्तो दुःखकण्टकसंकटे । सुदुष्प्रापसुखच्छाये पान्थः संसारवर्त्मनि ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहो कि स्वाप्न-स्मृति के समय वन आदि में देखा गया बाघ आदि स्वप्नदेश में निद्रा द्वारा निकट में लाया जाता है, यों यदि इदन्ता उसपर होगी तो उस वन मेँ वह बाघ आदि अन्यो द्वारा अनुभूत न होगा । निद्रा द्वारा एक ही बाघ दो तरह से स्थापित किया जाता है यह कहो, तो एक की ही दो प्रकार से स्थिति कैसी ?