Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
रणेऽज्ञानसमुद्भूते पूर्वं प्रहरणोद्यतम् ।
अपूर्वनर्मनिर्माणलीलाललनलालकम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सुप्ता:' इस पद के तात्पर्य का विवरण करते हैँ ।
जो लोग इस स्वप्ननगर में शय्याओं मे सोये हुए हैं, वे सुप्त (सोये हुए) कहे जाते हैं, किन्तु वे
जडता को प्राप्त नहीं हुए है, निद्रापरवश नहीं हुए हैँ