Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, Verses 9–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 171, verses 9–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 171 · श्लोक 9-20
संस्कृत श्लोक
सर्गस्यादौ तथैवेदमात्मैव स्वात्मनात्मनि ।
व्योमात्मैव चिदाभासं दृश्यमित्यवभासते ॥ ९ ॥
यथा पुरतया भाति मनः संकल्पमन्थरम् ।
तथा दृश्यमिवाभाति सर्गादौ चिन्नभः परम् ॥ १० ॥
यथात्मन्यनिलः स्पन्दश्चक्रावर्तवदीहते ।
सर्गादौ चिन्नभः स्थित्वा दृश्यमित्येव तिष्ठति ॥ ११ ॥
अतो ज्ञातमनाभातमेव दृश्यं जगत्त्रयम् ।
ब्रह्मैवेदं परं भाति स्वात्मनीत्थमवस्थितम् ॥ १२ ॥
नास्त्येव मूर्तं पृथ्व्यादि किंचनापि कदाचन ।
अस्तु मूर्तममूर्तं वा ब्रह्मैवेदं विराजते ॥ १३ ॥
प्रबोधकाले स्वप्नाद्रिर्यथा व्योमैव निर्वपुः ।
तथेदं शान्तचिन्मात्रं खं प्रवोधे जगत्त्रयम् ॥ १४ ॥
प्रबुद्धानां परं ब्रह्म निर्विभागमिदं जगत् ।
धीमन्तोऽपि न तद्विद्मो यदिदं त्वप्रबोधनम् ॥ १५ ॥
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ यन्मध्ये संविदो वपुः ।
स्वस्वभावो हि भूतानां तत्पदं परमात्मकम् ॥ १६ ॥
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ यन्मध्ये संविदो वपुः ।
एतत्तत्परमाकाशमत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १७ ॥
यादृगेतत्पदं तादृगिदं सदसदात्मकम् ।
येनार्थपञ्चकादन्यत्किंचनापि न विद्यते ॥ १८ ॥
रूपालोकमनस्कारा एतदेव पदं विदुः ।
एते ते द्रवतावर्ताः पदस्यास्य महाम्भसः ॥ १९ ॥
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ यन्मध्ये संविदो वपुः ।
एतस्याव्यतिरेकेण जगत्ता नास्ति काचन ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अग्नि सुवर्ण को शुद्ध कर देती है वैसे ही सभी अवस्थाओं में स्थित देह की वह शुद्धि
करनेवाला है तथा यह त्याज्य है यह ग्राह्य है इस प्रकार के विवेक में सदा तत्पर रहता है । वह
नगरनिवासी चतुर पुरुष के समान अनिन्दनीय (अश्लील आदि दोषों से रहित) कथाओं से आह्वादित
करनेवाला है तथा वचन, मन और शरीर की सुन्दर चेष्टारूपी मणि, माणिक्य आदि रत्नों की राशि
का भण्डार है। जैसे सूर्य दूर से ही अन्धकार को हटा देता है वैसे ही वह सत्कर्मरूपी मित्र अप्रिय वस्तु
को दूर से ही हटा देता है,समीप में नहीं आने देता तथा अनुरागयुक्त स्त्री की नाई सदा प्रिय वस्तु ही
दिखलाता है यानी प्रिय वस्तु को ही समीप में आने देता है । अपने सम्पर्क में आये हुए जनको प्रिय
बोलनेवाला बना रहा तथा सदा प्रिय ही कर रहा वह मित्र कोमल, मधुर,स्नेहमय, क्षोभरहित और
अप्रमादी है। अपने सम्पर्क में आये सत्पुरुषों की सेवा-शुश्रुषा करता है, पूजनीय है, स्मितपूर्वक बोलता
है, कामना से रहित है अतएव सज्जनों के रूप के समान रूपवाला है तथा परमार्थ का (मोक्षका)
एकमात्र कारण है दैवात् अज्ञानी लोगों के साथ हुए युद्ध में पहले प्रहार करने में उद्यत रहता है यानी
अत्यन्त शूर है तथा लोकोत्तर क्रीडा, हास्य आदि कौतुकों के निर्माणों द्वारा लीला और लाड़-प्यारों
से विलास करानेवाला है । सुशीलसम्पन्न नारियों का तथा कुल का पालन करनेवाला है और
आधिव्याधि से परिपूर्ण चित्त का अमृत के समान जीवनौषध के तुल्य है एवं चित्त के राग को हटानेवाला
है। विशेषरूप से विद्रता और वादों द्वारा प्रभु, गुरु आदि संमाननीय उत्कृष्ट लोगों का मनोरंजन करता
है यानी उनके मन में कौतुक उत्पन्न करता है। कहीं पर समान कुल और शील होने के कारण विभाग
से द्विधाभाव में (द्वैत में) स्थित-सा है । उत्तम राजा, व्यापारी आदि को अनुरक्त बनाकर सदा दानवीर
बना रहा वह सदा यज्ञ, दान, तपस्या, तीर्थयात्रा और न्याय के लिए प्रेरणा करने में तत्पर रहता है।
उससे पुत्र, पत्नी, द्विजाति (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य), दास, दासी ओर बन्धु जनों के सहित सुन्दर
भोजनपान के योग्य उत्तम पुरुषों के साथ संगति होती है । भोग आदि में दुःखदायी बद्धतृष्णता का
(अतितृष्णा का), सदा निवारण कर रहा वह मित्र स्नेहमय सुन्दर कथा-वार्ता में अत्यन्त दक्ष है और
समाश्वासन का (ढाढस बोधने का) उत्तम स्थान हे । इस तरह के स्वकर्मनामक सपत्नीक अपने मित्रसे
संयुक्त पुरुष स्वभाव से ही रमता है न कि किसी से प्रेरणा पाकर