Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वयमेव कचत्यच्छाच्छा येयं स्वा महाचितिः ।
सर्गाभिधानमस्यैव नभ एवेह नेतरत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव जगत् के बाध के बिना निर्विकल्प समाधि पर्यन्त ध्यानमात्र से आत्मोद्धार माननेवाले योगियों
का भी निराकरण हो गया, ऐसा कहते हैं।
योगियों का अभिमत आत्मा आनन्दचिद्रूपविहीन है। उसका साक्षात्कार होने पर भी वह पुरुषार्थरूप
नहीं हे । इसलिए उसके साक्षात्कार की कल्पना में कोई प्रयोजन नहीं हे, अतः नित्य अनुमेयरूप तथा
मीमांसकों के ज्ञान के तुल्य अपरोक्षभूत उसमें जडता ही परिशिष्ट रहती है । उसमें हुई चित्त की
निर्विकल्प समाधि केवल जडता ही है, उसमें हुई सविकल्प समाधि तो संसार ही है । इस कारण
योगियों का ध्यान और उससे सम्पन्न हुई समाधि भी नहीं के बराबर है। कुछ भी पुरुषार्थरूप नहीं है,
यह अर्थ है