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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

पश्चात्तस्यैव तेनैव स्वयमैश्वर्यशंसिना । कृतं बुद्ध्यादिपृथ्व्यादिकल्पनं सदसन्मयम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ स्वप्नपर्वत की तरह अन्दर भ्रान्तिरूप ही हैं। इस विषय में प्रत्यक्ष हेतु भी है वह यह कि यह जन आत्मा में इष्ट की ही सृष्टि करने और अनिष्ट की सृष्टिका निवारण करने के लिए समर्थ नहीं है । उसके द्वारा पहले से विचारित ही अर्थ निश्चय रूप से देखने में नहीं आता, अकस्मात्‌ ही कोई भी अतर्कित अन्य पदार्थ दृष्टिगोचर हो जाता है। सृष्टि को अन्य कारण के (प्रधान, परमाणु आदि के) अधीन मानने पर तो उक्त कारण सम्पत्ति से साध्य इष्ट का ही लोग सर्जन करेंगे ओर अनिष्ट का निवारण करेंगे, आकस्मिक दृश्य को न देखेंगे। उक्त तीनों हेतुओं की अन्यथानुपपत्ति से जगत्‌ स्वप्नपर्वत के समान भ्रान्तिरूप ही है, यह सिद्ध हुआ