Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
इदं सर्वं तनोतीव तच्च खात्मकमेव खम् ।
भवतीव जगद्रूपं विकारीवाविकार्यपि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब मुक्ति का यथार्थ स्वरूप क्या है ? इस पर कहते हैं।
हे श्रीरामजी, जिसमें दृश्य का अत्यन्त असम्भव है “सब कुछ ब्रह्म ही है” ओर "वही शुद्ध चिद्रूप
ब्रह्म मैं हूँ" इस प्रकार का निर्मल ज्ञान ही मुक्ति है । “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहब्रह्मास्मीति
"तस्मात्तत्सर्वमभवत्" इन श्रुतियों के अनुसार अधिष्ठानरूप से वह सब कुछ है ओर "यत्र नान्यत्पश्यति
नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति" इत्यादि श्रुति से अध्यासरूप से कुछ नहीं है वैसे ही वह जानता
है