Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
मन एव स्वयं ब्रह्मा स सर्गस्य हृदि स्थितः ।
करोत्यविरतं सर्वमजस्रं संहरत्यपि ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्यक् ज्ञान से वह परम निर्वाण कहा गया है, निर्वाण में यह यथास्थित सारा विश्व अत्यन्त
प्रलय को प्राप्त होता है