Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 175, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
पृथ्व्यादिरहितो यस्मिन्मनोहृद्यङ्गवर्जिते ।
अन्यद्वा त्रिजगद्भाति यथा स्वप्ने निराकृति ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें न भेद है ओर न अभेद है, न कुछ है ओर किंचित् है वह सब सद्
असद् भावों की चरम सीमा कहा गया हे । जैसे पट सत् है या असत् इस कल्पना की सीमा तन्तु (सूत)
है, तन्तु सत् है या असत् हे इस कल्पना की अवधि कपास है, कपास सत् है या असत् है इस कल्पना की
सीमा कपास का बीज है, कपास का बीज सत् है अथवा असत् इस कल्पना की सीमा मिट्टीरूप पृथिवी
है, पृथिवी सत् है अथवा असत् इस कल्पना की सीमा जल है, जल की सद्असद्भावकल्पना की सीमा
तेज है, तेज की सद्असद्भावकल्पना की सीमा वायु है, वायु के सद्असद्भाव की कल्पना की सीमा
आकाश है, आकाश की सद्असद्भावकल्पना की सीमा अव्याकृत है ओर अव्याकृत की
सद्असदभावकल्पना की सीमा केवल चिदात्मा ही है, इस तरह वह सीमान्त कहा गया हे