Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अर्धप्रबुद्धसंकल्पविकल्पाद्वैतकल्पितम् ।
वदाम्यभ्युपगम्येदं न तु बोधदशास्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या बिना किसी आलम्बन के ही कल्पना होती है ? इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हैं।
जैसे कल्पनात्मक चेतनपुरुष केश, नख आदि अचेतन युक्त प्रतीत होता है वैसे ही कल्पनात्मक
स्वभाव एक ब्रह्म ही यह जगत् है यानी ब्रह्म मेँ अचित् अंश कल्पित ओर चित् अंश अकल्पित है ये दोनों
मिले अंश ही जगत् हैं