Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
प्रवदत्सु वरेष्वेवं शापाः कुद्धधियो वरान् ।
विवस्वता कृता यूयं वयं रुद्रांशतः कृताः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
बैठा रहता हूँ