Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
शापेषूद्यतशृङ्गेषु वरा इदमरातिषु ।
विहसन्तः प्रवक्ष्यन्ति प्रमेयीकृतनिश्चयम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
कभी न मुरञ्चानेवाले इस कदम्ब वृक्ष
को, इसे वागीश्वरी का मन्दिर समझकर, लोग खूब पूजते हैं । एकमात्र समाधि में मग्न रहनेवाले मुझे
भी खूब पूजते हैं