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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

पितामहपुरीं गत्वा कलहान्ते विनिर्णयः । कर्तव्योऽस्माभिरेतत्किमादौ नेह विधीयते ॥ २१ ॥ शापैर्वरोक्तमाकर्ण्य बाढमित्युररीकृतम् । को न गृह्णाति मूऽढोऽपि वाक्यं युक्तिसमन्वितम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए हे साधुपुरुषों, यहाँ आये हुए आप लोग उठकर घर जायें । वहाँ आपके सब भाइयों का स्त्री-बन्धुओं के साथ समागम हो चुका है । जैसे ब्रह्मलोक में (देवलोक में) आठ वसुओं का भव्य समागम हुआ वैसे ही अपने घर पर आप आठों महात्माओं का भव्य समागम होगा