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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 23–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verses 23–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 23,24

संस्कृत श्लोक

ततः शापा वरैः सार्ध यास्यन्ति ब्रह्मणः पुरम् । महानुभावा हि गतिः सदा संदेहनाशने ॥ २३ ॥ प्रणामपूर्वं तत्सर्वं यथावृत्तं परस्परम् । ब्रह्मणे कथयिष्यन्ति श्रुत्वा तेषां स वक्ष्यति ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे आर्य सभासदो, उसके यह कहने पर मैंने सन्देह से उस महातपस्वी से यह आश्चर्य वृत्तान्त पूछा, उसे मैं आप लोगों से कहता हूँ : भगवन्‌, सुनने में आता है कि यह एक ही सप्तद्वीपा भूमि है । ऐसी अवस्था में तुल्यकाल मे आठों सप्तद्वीपा वसुमती के अधिपति कैसे होंगे ?