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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 40–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verses 40–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 40-42

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा स स्वयंशापः क्वापि शापगणो ययौ । प्रशान्ते तिमिरे दृष्टे व्योम्नि केशोण्ड्रकं यथा ॥ ४० ॥ अथान्यो वरपूगोऽत्र गृहनिर्गमरोधकः । स्थानिस्थानमिवादेशः समानार्थोऽभ्यपूरयत् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे लोक-कल्याण के लिए निर्दोषरूप से उद्यत हुई मेचमाला की ध्वनि बन्द होती है वैसे ही उत्तम कल्याण के लिए उद्यत हुई भगवती पार्वतीजी की वाणी यह कहकर विरत हुई । श्रीदेवी के चले जाने पर कुछ समय के पश्चात्‌ उनके वे सब पति महावर प्राप्त दिशाओं से वापस आये । आज यह (आठवाँ भाई) पति भी अपनी पत्नी के समीप जाय, भाईयों और बन्धुबान्धवों का आपस में समागम हो