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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 69

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 69

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार समग्र वस्तुओ के भिन्न-भिन्न स्वभावो की भी उसी ने रचना की है, यह कहते है । इस ब्रह्म की चेतनता, आकाश की सच्छिद्रता, वायु की सचेष्टता, अग्नि की उष्णता, जल का द्रवत्व, भूमिका काठिन्य आदि सब उसीने रचा हे