Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 70–71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verses 70–71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 70,71
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हिन्दी अर्थ
इस प्रकार यह सव कल्पना प्रजापतिरूप चिदाकाश की ही रचना है, यह कहते हैं।
इस चिदात्मा का ऐसा स्वभाव है कि आकाशात्मा भी यह जो जो विचार करता हे सत्यसंकल्प होने
से उस सबका शीघ्र ही तुम्हारे, मेरे ओर उसके सदृश अनुभव करता हे । वह चिदाकाश जिस वस्तु को
जैसा समझता है वह वस्तु पूर्णरूप से वैसी ही हो जाती है, जैसे स्वप्न में तुम हम आदि स्वप्न पदार्थ हो
जाते हैं, सद् आत्मा भी वह असद्रूप (जगदस्वरूप) हो जाता है