Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 26
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, सृष्टि के आदि में अचेतित जगत् के भान की सिद्धि नहीं है अतः
अनादि अनन्त शुद्ध चिन्मात्र ही सृष्टि के आदि में जगत् का संकल्प करता है तब इस जगत् का भान
होता है यह अवश्य मानना पड़ेगा। उस चिन्मात्र में चेत्य का संभव कैसे हो सकता है यह मुझसे कहने की
कृपा कीजिये