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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 27

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, कारण का अस्तित्व न होने के कारण चेत्य का तनिक भी संभव नहीं हे । चेत्य का अभाव होने से चेतन की सदा मुक्तता तथा वर्णनातीतता सिद्ध हुई । उत्तर का भाव यह हे कि चेत्य यदि सृष्टि के आदि में उत्पन्न होता तो वह किससे उत्पन्न हुआ इस प्रश्न का अवसर आता। अत्यन्त असंभूत वन्ध्यापुत्र की उपपत्ति-जिज्ञासा से क्या प्रयोजन है ? नित्यमुक्त ही आत्मा को स्वीकार करना चाहिये