Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 62–63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verses 62–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 62,63
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, इस संसारचक्र के क्रमशः पिंडग्रहविहीन (स्थूलाकारशून्य)
होने पर निर्विक्षेपता का साधक दूसरा क्या हे ? पूर्ण शान्ति कैसे होती है ?
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुपुंगव, साकारताभ्रम के निवृत्त होने पर जब जगत् केवल चितूमात्रता
को प्राप्त हो जाता है, विनाशाभावरूप गौरव से उन्मुक्त हो जाता है तब जगत् मेँ भोगों की आस्था का
शमनरूप परम वैराग्य हो जाता हे