Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 64
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, बालक के संकल्पभूत अतितुच्छरूप से स्थित देदीप्यमान
इस जगत् में दुःखहेतुभूत आस्था की निवृत्ति कैसे होती है ? अत्यन्त तुच्छ संकल्पवाला बालकरूप नर
भी दुःख का अनुभव करता हुआ कैसे दिखाई देता हे ?