Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
उस योगी को व्युत्थान काल में
विश्वरूपनामक ओर अन्यत्र (समाधिकाल में) ब्रह्मनामक सृष्टि-असृष्टिरूप चिन्मात्र सर्वत्र भासता
हे