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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

जो योगी समाधि से व्युत्थित तथा समाधिस्थ होकर अभिन्नबोधरूप सद्रूपस्वरूपानुभव में ही स्थित हो व्युत्थान ओर समाधि को उदासीन वृत्ति से देखता है यानी किसी एक में विशेष आसक्ति नहीं रखता, वही संसाररूपी विक्षेप से शान्ति प्राप्त करता है अन्य नहीं