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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

जैसे आकाश की शून्य से अतिरिक्त दूसरी वास्तविकता नहीं है वैसे ही जगत्‌ के समस्त पदार्थो की केवल बोधमात्र यथार्थरूपता के बिना अन्य वस्तुस्थिति नहीं है, इस प्रकार का जिसमें बोध होता है इस प्रकारकी उस योगी की सद्स्वरूपानुभव में स्थिति है