Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
अखण्डार्थक वाक्यलक्ष्यता की
विश्रान्ति होने पर यानी अखण्डार्थक वाक्यलक्ष्यत्व -रूप से स्थिति होने पर अत्यन्त शान्त हुए योगीजनों
की जो कोई अवर्णनीय परासत्ता है वह शेष रहती है अथवा नहीं भी रहती है । दोनों ही प्रकारो में
वाणियों की भी गोचरता को वह दशा प्राप्त नहीं होती है