Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जैसे
शिल्पी की बुद्धि में न गढी हुई शिला के भीतर स्थित प्रतिमाएँ यथेष्ट रूप से स्फुरित होती हैं वैसे ही
भावउपहित अखंडित (अविच्छिन्न) ही ब्रह्म जगत् के रूप में स्फुरित होता है