Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verses 26–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verses 26–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 26-28
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जैसे जलाशय में
स्थित लहरियाँ स्फुरित होती है वैसे ही महाचिति स्वयं अन्नमयादिकोश में स्थित तथा ब्रह्माण्डकोश में
स्थित चेत्य होकर स्फुरित होती है । अज्ञान आवृत आत्मा के रूप से जड़ तुल्य परमार्थाकाश के (सन्मात्र
के) कृत्रिमवेष से युक्त अविभक्त (अद्वितीय) आत्मा की विभक्त ऐसे शान्त अनन्त जिन जिन जीवों ने
जैसे जैसे भीतर भावना की ओर जैसे जैसे संकल्प किया उन उन जीवों के भोग और मोक्ष के भेदों में वह
वैसे ही उदित हुआ हे