Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
ज्ञान होने पर किस क्रम से भ्रान्ति का अनुद्भव होता है । इस प्रश्न पर उसे कहते हैं।
भगवन्, सम्यग् ज्ञान होने पर देह से सम्बन्ध रखनेवाले भोग ओर भोगों के उपायों में ऐसे ही
अवितृष्णा (विरक्ति) हो जाती है जैसे कि यह स्वप्न है यह जानने पर स्वप्न के पदार्थों में विरक्ति होती
हे