Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
वेराम्य से बोध की अभिवृद्धि होती है ओर बोध से वैराम्य की वृद्धि होती है । बोध ओर वैराग्य
ये दोनों दीवार और प्रकाश के तुल्य एक दूसरे से प्रगट होते हैं जिस कारण अवितृष्णा (वैराग्य) अथवा
स्त्री, पुत्र, धन आदि तत्त्वाभिनिवेशरूप बोध से ही पूर्णरूप से सम्पन्न है उसका (वैराग्य का) विरोधी
अथवा उसका (धन दारादिका) अनुकूल जाड्य भी तत्-तत् में अभिनिवेश के अनुसार ही स्थित
है