Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verses 21–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 198, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस
शास्त्र से अविद्या का सात्त्विक अंश उत्कृष्ट (उन्नत) बनाया जाता है अविद्या के अभ्युन्नत हुए सात्विक
भाग से तामसिक अंश क्षीण हो जाता है। शास्त्ररूपी जल से मल को धोनेवाला पुरुष अचिन्त्य शास्त्रादि
के प्रभाववश ज्ञेय नित्य शुद्ध आत्मवस्तु की सामर्थ्य से परम शुद्धि को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी
सन्देह नहीं है