Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verses 23–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 198, verses 23–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 23-25
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्य और समुद्र का आमना-सामना होने पर उनकी इच्छा न होने पर
भी पहले से अदृश्य भी तीसरा (प्रतिबिम्ब) स्वच्छ और प्रकाश स्वभाव से स्वतः हो जाता है। वहाँ
पर जैसे केवल अपनी सन्निधि से सत् असत् विशाल अनुभवसिद्ध स्फुरणवाला प्रतिबिम्ब पड़ता है
वैसे ही मुमुक्षु (मुक्ति चाहनेवाले) ओर शास्त्र का परस्पर सम्बन्ध होने से ही सकल ज्ञानं के विषय
से परे आत्मज्ञान होता हे