Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 198, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जैसे यद्यपि आकाश में प्रकाश चारों ओर फैला रहता है तथापि प्रभा ओर दीवार के संग से ही अभिव्यक्त
होकर साफ-साफ अनुभव में आता है वैसे ही नित्य स्वप्रकाशरूप आत्मज्ञान भी महावाक्य के श्रवण
ओर उसके अधिकारी के मिलन से स्पष्टतः अनुभव में आता है