Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 198, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
आत्मज्ञान की प्राप्ति मेँ अन्यान्य (आत्मज्ञान मे अनुपयोगी) शास्त्रों के श्रवण अथवा उनकी विद्रत्ता
का कदापि उपयोग नहीं होता है, ऐसा कहते है ।
जिस शास्त्र श्रवण का केवल त्रिवर्ग की (धर्म, अर्थ ओर काम की) सिद्धि ही फल हे मोक्ष फल नहीं
है तत्त्ववेत्ताओं की तत्त्वबोधोपाय चर्चा में वह शास्त्र-श्रवण केवल मूर्खता ही है क्योकि
मिथ्याविषयफलवाला होने से वह तुच्छ ही है