Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
यैस्तु संपूज्यते कर्म तन्मूलं तैर्न मुच्यते ।
मूलं स्वकर्मणः संविन्मनसो वासनात्मनः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने कर्म का
मूल वासनात्मक मन सम्बन्धी चिदाभास संवित् ही है। उसका उच्छेद जब तक यह शरीर है तब
तक ज्ञान के बिना हो नहीं सकता