Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
किं जगत्किं च सर्गादि काश्चिन्नित्यं तमोधराः ।
व्योमसंस्थार्णवाः काश्चित्काश्चित्कृमिकुलाकुलाः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव स्वप्न आदि की निवृत्ति होने पर भी वह तत्त्व (भान) कभी शान्त नहीं होता, ऐसा कहतेहै।
उक्त चिद्भान ही स्वप्न ओर जगत् शब्दों से निर्दिष्ट होता हे । चित् का भान स्वभाव (तत्त्व) हे ।
वह चिदाकाशरूपी भान कभी शान्त नहीं होता