Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चिरं नित्यानुभूतोऽपि जगदर्थो न किंचन ।
विद्यते पुरुषस्येह स्वप्ने स्वमरणं यथा ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी की दृष्टि से अन्यत्र यानी ज्ञानी की दृष्टि में चिन्मय स्वप्न, द्वैत, अद्वैत,
शुभ, अशुभ आदि सब कुछ की आवरणशून्य चिन्मात्र से तुलना की जा सकती है