Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
प्रतिरात्रं प्रतिदिनं पुरः पश्चादुपर्यधः ।
पश्यस्यालोकयँल्लोकानपश्यंश्च न पश्यसि ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई प्रश्न करे कि अन्य प्रकार से ध्यान करने पर अन्य प्रकार का फल क्यो नहीं होता 2 तो
इस प्रश्न पर कहते है।
ध्यानकर्ता जैसा दृढ़संकल्प होकर स्वभाव का ध्यान करता है उस स्वभाव का अविनाशिनी
साक्षिसंवित् वैसे ही अनुभव करती हे उससे विपरीत अनुभव नहीं करती