Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verses 30–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 215, verses 30–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 30-35
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अब महामुनि श्रीवसिष्ठजी मंगलादीनि मंगलमध्यानि म॑गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते
वीरपुरूषकाण्यायुष्मत्पुरुषकाणि च भवन्ति अध्येतारश्व मगलयुक्ता यथा स्युः“ -अथात् जिन शास्त्रों
के आदि में, मध्य में और अन्त में मंगलाचरण किया जाता है वे लोक में खूब प्रसिद्ध होते हैं उन्हे बनाने
तथा पढानेवाले पुरुष वीर ओर दीर्घजीवी होते है, उनका अध्ययन करनेवाले भी वैसे ही होते हैं -
भाष्य में भगवान् पतंजलिजी द्वारा उद्धृत श्रुति के अनुसार निर्विघ्न सम्पूर्ण हए महान् शास्त्र के उक्त
फल की सिद्धि के लिए श्रीवसतिष्ठजी ब्राह्मण, देवता, पितर, मुनिवृन्द के पूजोत्सव आदिरूप मगल की
ओचित्यज्ञापन द्वारा आज्ञा देते हैं।
हे महाराज, हे रघुकुल को आह्नादित करनेवाले चन्द्ररूप, जो मैं कहता हू, उसे कीजिये । इतिहास
कथा के अंत में द्विजातियों की पूजा करना विधिप्राप्त तथा उचित है, इसलिए आज आप विप्रवृन्दों को
उनकी सकल कामनाओं से परिपूर्णं कीजिये इससे आपको अध्यात्मशास्त्र की श्रवणविधि की सांगोपांग
निष्पत्ति का अक्षय फल प्राप्त होगा । मोक्ष के उपायभूत कथा की समाप्ति होने पर कीड़े की तरह नगण्य
दरिद्र को भी अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणपूजन अवश्य करना चाहिये आप जैसे महाराज के लिए
तो कहना ही क्या है ? महामुनि श्रीवसिष्ठजी का यह वचन सुनकर महाराज दशरथ ने दस हजार वेदज्ञ
ब्राह्मणों को दूतों द्वारा निमन्त्रित किया । मथुरा में, सौराष्ट्र देश में, गौड़ देश में जो ब्राह्मण निवास करते
हैं उन श्रेष्ठ-श्रेष्ठ ब्राह्मणों के कुलो को सत्कारपूर्वक बुलाकर अधिकाधिक ज्ञानविज्ञानवाले ब्राह्मणों
को प्रमुखता देकर राजा ने दस हजार ब्राह्मणों को सविधि भोजन कराया